Dawah & iqra
June 3, 2025 at 12:24 AM
*#593 - जैसे ही ईद-उल-अज़्हा के मुबारक दिन करीब आते हैं,* आईए हम क़ुरबानी की हक़ीक़ी रूह को याद करें — जो सिर्फ़ जानवर की क़ुरबानी नहीं, बल्कि अपने नफ़्स, घुरूर और दुनियावी मोहब्बतों की क़ुरबानी भी है। 🕊️
*जैसे हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अल्लाह के हुक्म के सामने बेपनाह इताअत और तस्लीम व रज़ा का मुज़ाहिरा किया,* वैसे ही हम भी उसी अख़लास और मोहब्बत के साथ अल्लाह की रज़ा के सामने सर झुका सकें। 💖
*यह क़ुरबानी हमें याद दिलाए कि:*
हम सख़ावत से दें,
दिल से माफ़ करें,
और अल्लाह की खातिर बेपनाह मोहब्बत करें। 🤲
अल्लाह तआला हमारी क़ुरबानियों को कुबूल फरमाए, हमारे दिलों को साफ़ करे और हमारे घरों को बरकत, रहमत और इत्तिहाद से माला-माल फरमाए।
*आमीन या रब्बल आलमीन।*
🤲
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