Sanatan Dharma 🚩 (धर्म, संस्कृति और आध्यात्म)
June 19, 2025 at 08:19 AM
व्यक्ति अपने मन में बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाता है। "मैं पढ़ लिखकर विद्वान बनूंगा। डॉ बनूंगा। इंजीनियर बनूंगा। पायलट बनूंगा। बड़े-बड़े बंगले बनाऊंगा। बड़ी-बड़ी कारें खरीदूंगा। बहुत सी धन संपत्ति होगी। बहुत सारे नौकर चाकर होंगे। वे सब मेरा सम्मान करेंगे। मुझे खिलाएंगे पिलाएंगे और मेरी खूब सेवा करेंगे। फिर मेरे बेटे हो जाएंगे, मैं उनका पालन करूंगा। फिर वे बड़े हो जाएंगे। उनकी शादियां हो जाएंगी। उसके बाद मेरे पोते हो जाएंगे। और बस इसी तरह से मैं पूरा जीवन आनंद से जिऊंगा इत्यादि।"
"वह इन योजनाओं में केवल सुख ही देखता है। और यह नहीं देखता कि कभी इन सारे कार्यों को करते समय कुछ दुख भी आएंगे। कुछ बाधाएं भी आएंगी। मुझे उनसे भी संघर्ष करना होगा। उसके लिए वह प्रायः नहीं सोचता।"
और जब बाधाएं आती हैं, तब वह बहुत दुखी हो जाता है। रोने धोने लगता है, कि "मैंने तो क्या-क्या सोचा था? और मुझे तो किसी ने भी सुख नहीं दिया।" कुछ लोग कहते हैं, "मैंने जीवन भर दुख ही भोगे हैं। सुख तो मुझे देखने तक को भी नहीं मिला इत्यादि।"
ऐसी योजनाओं को बनाते चलाते पूरा करते-करते व्यक्ति इन सांसारिक कार्यों में इतना अधिक डूब जाता है, कि वह यह भी भूल जाता है, कि "एक दिन मुझे मरना भी है। एक दिन ये सारी संपत्ति पुत्र परिवार छोड़कर संसार से जाना भी है।" और इस भारी भूल के कारण वह कभी भी अपनी मृत्यु की मानसिक तैयारी नहीं करता।
"और जब वह घड़ी आती है, तब वह फूट-फूट कर रोता है, पश्चाताप करता है, कि "हे भगवान्! मैंने सारा जीवन यूं ही व्यर्थ के कार्यों में खो दिया। न कोई भक्ति की। न समाज की सेवा की। न कोई विशेष पुण्य कमाया। अब मेरा क्या होगा?"
"यदि आप भी इस प्रकार के पश्चाताप से बचना चाहते हों, तो संसार के काम अवश्य करें, परंतु उनमें इतना न डूब जाएं, कि आपको जीवन की समाप्ति पर इस प्रकार का पश्चाताप करना पड़े।"
"अतः अभी से कुछ पुण्य भी कमाएं। समाज सेवा भी करें। कुछ परोपकार के कार्य करें। वेद प्रचार गौरक्षा वृक्षारोपण यज्ञशालाओं और वैदिक गुरुकुलों में दान देना आदि शुभ कर्मों का आचरण करें। और अपनी आत्मिक उन्नति के लिए ईश्वर का ध्यान उपासना वैदिक यज्ञ स्वाध्याय सत्संग आदि शुभ कर्मों का अनुष्ठान भी करें।"
🪷 ओम शांति 🪷
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