Yogendra Yadav
Yogendra Yadav
May 27, 2025 at 10:36 AM
नेहरू को लेकर एक समाजवादी की द्विविधा — गोपाल राठी ------------------------ हमारे प्रेरणा पुरुष डॉ लोहिया को नेहरू का कट्टर विरोधी माना जाता था । जबकि आजादी के पूर्व लोहिया नेहरू जी के बहुत करीब थे । समाजवादी आंदोलन के पितामह आचार्य नरेंद्र देव नेहरू जी के मित्र थे और दोनों अहमदनगर जेल में एक साथ कैद थे । इस जेल में नेहरू जी ने डिस्कवरी ऑफ इंडिया जैसी महान किताब लिखी थी । जेल में संदर्भ के लिए कोई लाइब्रेरी होने का सवाल ही नहीं उठता । ऐसी स्थिति में नेहरू जी हर नए अध्याय लिखने के पूर्व आचार्य से विचार विमर्श किया करते थे । आचार्य नरेंद्र देव और नेहरूजी के अंतरंग रिश्तों का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जब इंदिरा जी ने पहले पुत्र को जन्म दिया तो उसका नामकरण राजीव आचार्य नरेंद्रदेव ने किया था । समाजवादी आंदोलन के ही बड़े नेता जयप्रकाश नारायण का नाम नेहरू जी के उत्तराधिकारी के रूप में लिया जाता था जबकि वे कांग्रेस में नहीं थे । 1934 में समाजवादी विचारों से प्रेरित कुछ युवाओं ने कांग्रेस के अंदर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया । नेहरू जी ने इस पहल का स्वागत किया था । 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में गांधी जी नेहरू जी सहित कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया था । उस विषम परिस्थिति में आंदोलन को चलाए रखने के लिए लोहिया और जेपी जैसे युवा समाजवादियों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई । देश आजाद होने के बाद देश के विकास के लिए समाजवादी मॉडल की बात करने वाले लोगों को अतिवादी कहा जाने लगा । कांग्रेस में मौजूद दक्षिणपंथी लोगों को समाजवादियों से दिक्कत होने लगी । समाजवादी गांधी मोह के कारण कांग्रेस में थे । गांधी जी के अवसान के बाद यह मोह भी भंग हो गया । समाजवादी समूह को लगने लगा कि अपने वैचारिक आग्रह के साथ कांग्रेस में बना रहना नामुमकिन है । इसलिए 1948 में समाजवादियों ने अपने पैतृक घर कांग्रेस को छोड़कर अलग रास्ते पर चलना शुरू किया । अर्थात सत्तारूढ़ कांग्रेस के खिलाफ एक विपक्षी दल का उदय हुआ । तब तक भारत का नया संविधान नहीं बना था और कांग्रेस ने समाजवाद को भी नहीं अपनाया था । समाजवादी लोग नया भारत बनाने के लिए समाजवादी नीतियों के हिमायती थे । बाद में 1956 में कांग्रेस ने अपने सम्मेलन में समाजवादी समाज बनाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बताई । कुछ समाजवादी कांग्रेस की इस घोषणा के कारण वापिस कांग्रेस में चले गए लेकिन जो बचे थे उन्होंने अपने लिए सशक्त विपक्ष की भूमिका चुनी । इस धारा में लोहिया एक प्रखर विपक्षी नेता के रूप में उभरे जिन्होंने संसद में अपने कई सवालों से सरकार को निरुत्तर कर दिया । उन दिनों सरकार का विरोध करने वालो को देशद्रोही नहीं कहा जाता था । हमारी राजनैतिक यात्रा समाजवादी विचारों के साथ शुरू हुई । जब हमारी आयु मात्र 16 साल थी । उन दिनों समाजवादी और जनसंघी जनता पार्टी नामक राजनैतिक दल में इकट्ठे थे । हम सब इमरजेंसी लगाने वाली कांग्रेस के खिलाफ थे । उन दिनों हमारी राजनैतिक सोच सिर्फ इतनी थी कि हमें कांग्रेस का विरोध करना है । हमारे पास अन्य सूचनाओं का कोई स्रोत नहीं था लेकिन हमारे जनसंघी साथी हमें रोज रोज संघ की शाखा से आकर नई जानकारी देकर हमारा ज्ञान वर्धन करते थे । उन्होंने एक दिन बताया कि नेहरू जी के कपड़े घुलने के लिए लंदन जाते थे । फिर बताया कि नेहरू ने विभाजन करवाया , नेहरू नंबर एक का अय्याश था , नेहरू के पूर्वज मुसलमान थे इसलिए मुसलमान कांग्रेस को वोट देते है । सच बताऊं उन दिनों मुझे जनसंघी मित्रो की बात ठीक लगती थी । मैं भी अपनी चर्चा में इन्हीं बातों को दोहरा कर कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाया करता था । 1980 में जब जनता पार्टी तोड़कर जनसंघियों ने भारतीय जनता पार्टी बनाई तो हमें बहुत धक्का लगा । तक तक हम दिनमान , रविवार ,धर्मयुग साप्ताहिक हिंदुस्तान सामयिक वार्ता पत्रिकाएं पढ़ने लगे थे और विचारधारा के अंतर को पहचानने लगे थे । लोहिया पर इंदुमती केलकर ,ओंकार शरद और ओमप्रकाश दीपक की जीवनी पढ़ी । गांधी लोहिया जयप्रकाश नारायण विनोबा की किताबें और पुस्तिकाएं पढ़ी । मार्क्स लेनिन शिवदास घोष कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो को पढ़ा । इसी समय नेहरू जी की किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया आदि किताबें पढ़ी । नेहरू जी पर अन्य लोगों द्वारा लिखी पुस्तक और लेख पढ़े । टीवी पर श्याम बेनेगल का भारत की खोज देखा । सच बताऊं नेहरू जी के बारे में मेरे दिमाग में जमा सारा कचरा साफ हो गया । मेरी अब तक बनाई गई सारी धारणाएं ध्वस्त हो गई । मुझे लंबे समय तक अपराध बोध रहा की नेहरूजी के बारे में मैं कितना गलत सोचता था । समाजवादी हम आज भी है । न कभी कांग्रेस को वोट दिया और न समर्थन किया । लेकिन जब दो कौड़ी टुच्चे और साम्प्रदायिक लोग नेहरू जी जैसे महान व्यक्तित्व के बारे में अनर्गल और गलत बात लिखते है तो अपना खून खौल जाता है । पिछले कुछ दिनों से मैं देख रहा हूं कि नेहरू जी पर संघी आक्रमण या चरित्र हनन पर कांग्रेसी आम तौर पर चुप रहते है । उसका माकूल जवाब समाजवादी या अन्य गैर कांग्रेसी वामपंथी मित्र देते है । कांग्रेसियों की यह वैचारिक दरिद्रता चिंताजनक है । यह सच है कि जवाहर लाल नेहरू कांग्रेस के नेता थे । लेकिन मेरा मानना है कि वे सिर्फ कांग्रेस के नहीं भारत और विश्व के महान नेता थे । पुण्यतिथि पर चाचा नेहरू का सादर स्मरण ( गोपाल राठी )
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