Mazdoor Bigul  मजदूर बिगुल www.mazdoorbigul.net
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May 26, 2025 at 04:23 AM
📮_____________📮 *गोरक्षा बहाना है – मकसद नफ़रत फैलाना है* ✍️ सत्यम 📱https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1253765833418873&id=100063564051862 ______________ गोकुशी को बार-बार राजनीतिक कारणों से मुद्दा बनाया जाता रहा है। अपनेआप आम लोगों के बीच कभी इसे लेकर कोई व्यापक मुद्दा नहीं बना। कहीं छिटपुट हुई घटनाओं को छोड़ दिया जाये तो कभी इसके कारण हिंसा की वारदातें नहीं होती थीं। लेकिन पिछले 11-12 साल में संघ-भाजपा गिरोह ने मीडिया और सत्ता के नंगे समर्थन के साथ इसे देशव्यापी नफ़रत और हिंसा का हथियार बना दिया है। इसकी आड़ में ज़िले-ज़िले में अवैध वसूली और लूटपाट करनेवाले अपराधियों के गिरोह खड़े हो गये हैं। दक्षिणपंथी ताक़तें आज़ादी के बाद से ही गोहत्या को मुद्दा बनाने की कोशिश करती रहीं लेकिन कभी उन्हें ज़्यादा सफलता नहीं मिली थी। गाय-प्रेम और गोरक्षा की नौटंकी संघ परिवार ने 1960 के दशक में बड़े पैमाने पर शुरू की थी। हालाँकि संघ परिवार के विचारधारात्मक गुरू, सावरकर, के मुताबिक गाय न तो कोई पवित्र पशु है और न ही माता है। सावरकर ने तो साफ़ कहा था कि गाय सिर्फ़ एक जानवर है। फिर संघियों के लिए गाय यकायक माता कैसे बन गयी और गोरक्षा का भूत उनके ऊपर कैसे सवार हो गया? वैसे 1960 के दशक में चला गोरक्षा आन्दोलन कामयाब भी नहीं हो पाया था और अधिकांश लोगों ने उस पर ध्यान भी नहीं दिया था। 1970 और 1980 के दशकों में संघ परिवार ने इस मसले को फिर से उठाया। उस समय तक जनता में बेरोज़गारी, महँगाई और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा के कारण बढ़े असन्तोष के माहौल में यह मसला गर्माने लगा। अपनी समस्याओं के वास्तविक कारणों की समझदारी न होने पर जनता को कोई नक़ली दुश्मन दिखाकर भरमाया जा सकता है। संघ ने यही किया। लेकिन वास्तव में इन्हें न तो गाय से कोई प्रेम है और न ही गोरक्षा से कोई लेना-देना है। यह महज़ लोगों को धर्म के नाम पर लड़ाने का इनका औज़ार है। अगर इन्हें वास्तव में गाय और गोवंश की चिन्ता होती तो इनकी लाखों माताएँ सड़कों पर भटक नहीं रही होतीं और प्लास्टिक खाकर मर नहीं रही होतीं। तब ये तथाकथित गौरक्षक उन गोशाला संचालकों को सज़ा देने के लिए झपटते जो गायों को भूखा मारकर ख़ुद मलाई काटते हैं। तब ये अमित शाह पर हमलावर होते जिन्होंने गोवा के चुनाव प्रचार में वादा किया था कि गोमांस पर रोक लगाने का भाजपा का कोई इरादा नहीं है। अगर ये वास्तव में गोमाता के रक्षक होते तो केन्द्रीय मंत्री किरण रिजिजू, नगालैण्ड के भाजपा नेता विसासोली ल्होंगू, मणिपुर के मुख्यमन्त्री बिरेन सिंह, मेघालय के भाजपा नेता अर्नेस्ट मावरी और केरल के उन तमाम भाजपा नेताओं के पीछे पड़ते जो बीफ़ खाने को अपना अधिकार बताते हैं। (और ठीक ही बताते हैं, हर किसी को उसकी पसन्द का भोजन खाने का अधिकार है।) मगर मसला यह है ही नहीं। गाय महज़ इन संघियों के हाथों में एक हथियार है। गोरक्षक के नाम पर अपराधियों के गिरोहों को लूटपाट और वसूली की छूट मिली हुई है। इसके बदले में वे संघ गिरोह के लठैतों और नफ़रती प्रचारकों के तौर पर काम करते हैं और संघ-भाजपा इन घटनाओं का इस्तेमाल साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए करते हैं।
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