दैनिक सुविचार 🌺🏵️😊🙋♂️
June 9, 2025 at 02:50 AM
9.6.2025
संसार में कुछ लोग सकाम कर्म करते हैं, और कुछ लोग निष्काम कर्म करते हैं। सकाम कर्म के तीन भेद होते हैं, शुभ अशुभ और मिश्रित।
*"शुभ कर्म वे कहलाते हैं, जिनके करने से अपना भी सुख बढ़े, और दूसरों का भी। जैसे यज्ञ करना, दान देना सेवा करना परोपकार करना प्राणियों की रक्षा करना ईश्वर का ध्यान करना वेदों का प्रचार करना आदि आदि।"*
*"अशुभ कर्म वे कहलाते हैं, जिनको करने से अपना तो तात्कालिक लाभ होता है, परंतु दूसरे की हानि होती है। और आगे चलकर कर्मकर्ता को भी उसका दंड भोगना पड़ता है। जैसे चोरी करना डकैती करना व्यभिचार करना झूठ बोलना दूसरों पर अत्याचार करना प्राणियों की हिंसा करना धोखा देना इत्यादि।"*
*"मिश्रित कर्म वे कहलाते हैं, जिनके करने से दूसरों का सुख भी बढ़ता है, और कुछ कुछ दूसरों की हानि भी होती है। इस तरह से लाभ हानि मिला जुला होने से इसे मिश्रित कर्म कहते हैं। जैसे झूठ बोलकर व्यापार करके धन कमाना, खेती करना, दुखी होकर सेवा करना इत्यादि।"*
*"यदि शुभ अशुभ और मिश्रित इन तीनों में से किसी भी प्रकार का कर्म किया जाए, और मन में यह इच्छा हो, कि इन कर्मों के बदले में हमें सांसारिक सुख धन संपत्ति सम्मान आदि प्राप्त होवे, तो इन्हें 'सकाम कर्म' कहते हैं। और यदि इन तीनों में से केवल एक अर्थात शुभ कर्म, मोक्ष प्राप्ति फल को लक्ष्य बनाकर किया जाए, तो उसे 'निष्काम कर्म' कहते हैं।"*
*"कर्म करते समय मन की भावना के आधार पर किसी सकाम शुभ कर्म को निष्काम कर्म के रूप में भी बदला जा सकता है। भावना के बदलने से कर्म की कोटि अर्थात कैटेगरी बदल जाती है। वह सकाम से निष्काम कर्म बन जाएगा। जैसा कि ऊपर बताया है।"*
*"क्योंकि मोक्ष फल, केवल शुभ कर्मों का ही होता है, बुरे कर्मों का नहीं। इसलिए इन तीनों सकाम कर्मों में से केवल एक ही प्रकार के अर्थात शुभ कर्मों को ही निष्काम कर्म बनाया जा सकता है, क्योंकि उसमें शुद्धता है। अशुभ कर्मों तथा मिश्रित कर्मों को निष्काम कर्म नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि उनमें बुराई का सम्मिश्रण है।"*
*"अब चाहे व्यक्ति सकाम कर्म करे, चाहे निष्काम कर्म करे, वह स्वतंत्र है। यदि वह शुभ कर्म करता है, तो ईश्वर उसके कर्म के अनुसार उसको वैसा फल देता है। अर्थात सकाम कर्म करने पर सांसारिक सुख और निष्काम कर्म करने पर मोक्ष का सुख।"*
विशेष बात यह है कि *"जब कोई व्यक्ति इस प्रकार का शुभ कर्म करता है, उसके मन की भावना भी परोपकार की होती है, ईमानदारी और बुद्धिमत्ता से वह दूसरों का भला करता है, तो चाहे वह सकाम कर्म करे, चाहे निष्काम कर्म करे, तब ईश्वर उसे कोई कमी नहीं आने देता। ईश्वर उसे सकाम शुभ कर्म करने पर सांसारिक सुख साधन देता है। और निष्काम कर्म करने पर उसे दोगुना लाभ होता है। अर्थात ईश्वर उसे सांसारिक सुख भी देता है, तथा आगे चलकर उसे मोक्ष का सुख भी देता है।"*
अतः हमारा सुझाव यही है, कि *"चाहे आप सकाम कर्म करें, चाहे निष्काम कर्म करें, परन्तु शुभ कर्म ही करें। तो आपका भविष्य बिल्कुल सुखमय एवं सुरक्षित है, अन्यथा नहीं।"*
---- *"स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."*
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