'अपनी माटी' पत्रिका
'अपनी माटी' पत्रिका
June 8, 2025 at 11:32 AM
कामता बाबू को लोग दफ़्तर में गाँधी जी कहा करते थे। कंपनी काम के प्रति पूर्ण समर्पित! यह समर्पण की भावना उनके रिटायरमेंट के बाद भी किसी आदत की भाँति कायम रही। अपने कार्यकाल के दौरान शायद ही कभी ऐसा मौका आया हो, जब उन्होंने किसी मजदूर का काम करने से आनाकानी की हो। दूसरों की सेवा की खातिर सदैव तत्पर रहते। सेवा की यह भावना उनके भीतर एक जुनून की भाँति हरदम विद्यमान रहती थी। कोई अंधे से पूछे कि तुम्हें क्या चाहिए तो नि:संदेह उसका जवाब होगा, " दो आँखें..!" उसी तरह कोई कामता बाबू से पूछता कि आपको क्या चाहिए तो वे कहते, " काम..और काम के सिवाय कुछ नहीं..!" चाहे दफ़्तर का पढ़ाई-लिखाई वाला कोई भी काम हो, बेकार बैठकर समय काटना उन्हें आता नहीं था। लेन-देन के मामले में भी वे अनोखे और अजूबे थे! अपने सर्विस जीवन में रिश्वत तो कभी ली ही नहीं उन्होंने, बस यही कहते रहे, " यह पाप है! नाजायज है! दूसरों का गला दबाना है, उनका हक छीनना है..। " हाँलाकि इसी गाँधीवादी सिद्धांत को लेकर उनका बड़ा बेटा महेश बाप से खफा - खफा रहता था। दिन भर जाने कहाँ-कहाँ भटकता फिरता और देर रात आकर घर में बाप से लड़ता। दोनों बाप-बेटों के बीच मतभेद कभी कम नहीं हुए। महेश सदैव उबाल में रहता -" कोई कुछ करना चाहे तो कैसे करे? इस घर में गांधी की आत्मा जो वास करती है।" कामता बाबू कसमसाकर रह जाते। उनके लिए सुकून की बात यह थी कि उनका छोटा बेटा नरेश अपनी बीए की पढ़ाई के साथ-साथ एक अखबार के दफ़्तर में प्रुफ रीडिंग का काम भी सीख रहा था। कामता बाबू को अपने इस होनहार बेटे से ढेर सारी उम्मीदें बँधी हुई थीं। *कहानी : कर्मयोगी / श्यामल बिहारी महतो* [ लिंक 👉 https://www.apnimaati.com/2025/03/blog-post_25.html ]
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